Tuesday, April 30, 2013

ध्वस्त उत्पादन प्रणाली की बहाली का आवाहन करता हुआ फिर आ गया कामगारों के खून से सींचा मई दिवस।

ध्वस्त उत्पादन प्रणाली की बहाली का आवाहन करता हुआ फिर आ गया कामगारों के खून से सींचा मई दिवस।


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


वैश्विक व्यवस्था और खुले बाजार की अर्थ व्यवस्ता के मुताबिक मजदूरों को मौजूदा समय की चुनौतियों को कबूल करने और क्रान्तिकारी इतिहास से प्रेरणा लेकर ध्वस्त उत्पादन प्रणाली की बहाली का आवाहन करता हुआ फिर आ गया कामगारों के खून से सींचा मई दिवस।मजदूर वर्ग के नेतृत्व में संपन्न क्रांतियों के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण घटना है। मई दिवस मजदूर वर्ग के अंतर्राष्ट्रीय इतिहास में मील का पत्थर है।विडंबना तो यह है कि मई दिवस का इतिहास भले ही क्रांतिकारी हो, पर नवउदारवादी दो दशक के दोरान भारतीय श्रमजीवी बहुसंख्यक जनता के लिए यह अवसर अपना मायने खो चुका है। क्योंकि भारतीय मजदूर आंदोलन राजनीतिक दलों के साथ नत्थी होकर कामगारों के हक हकूक के बजाय सत्ता की लड़ाई का हथियार में तब्दील है।


सौदेबाजी, समझौता और आत्मघाती आंदोलन के अर्थवाद में फंसकर भारतीय मजदूर आंदोलन मई दिवस के इतिहास से एकदम अलग हो गया है।खासकर बंगाल में जो उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हुई है, जो अर्थव्यवस्था बदहाल हुई है और जो ५६ हजार से ज्यादा औद्योगिक इकाइयां बंद होने के कारण करोड़ों कामगार बेरोजगारी के आलम में भुखमरी की जिंदगी जीते हुए रोज रोज मरकर जी रहे हैं, उसके लिए राजनीतिक हित में चलाये जानेवाले जंगी मजदूर आंदोलन को जिम्मेदार ठहराता है ठगा हुआ मजदूर वर्ग।श्रमिकों की समस्या आज ज्यों की त्यों रह गयी है।


हड़ताल अंतिम औरनिर्णायक हथियार होता है, पर मजदूर वर्ग के हक हकूक की बजाय सत्ता की राजनीति में हड़ताल का लगातार इस्तेमाल होने की वजह से बंगाल जो देशभर में औद्योगिक विकास में अव्वल था, अब दौड़ में कहीं नहीं है।


बेहतर हो कि इस मई दिवस पर मजदूर आंदोलन बदले हुए परिप्रेक्ष्य में उत्पादन प्रणाली और औद्योगिक माहौली की बहाली के लिे कोई सकारात्मक संकल्प करें और उसपर अमल करें।


हुगली नदी के दोनों तटों पर भारतीय मैनचेस्टर और शेफील्ड की जो रचना हुई, जैसे बीटी रोड के किनारे किनारे उद्योगों का जाल रचा, वह कैसे और क्यों सिरे सेखत्म हो गया और चारों तरफ तबाही का मंजर बन गया, कपड़ा मिलें खत्म हो गयीं, इंजीनियरिंग वर्क्स टप हो गया और जूट मिलें कब्रिस्तान में तब्दील हो गयीं, इस पूरे परिदृश्य को सिरे से बदलने के लिए अब सकारात्मक मजदूर आंदोलन  की आवश्यकता है जो सत्ता की राजनीति से एकदम अलहदा हो। तभी मई दिवस मनाने का कोई मायने निकल सकता है।


बंगाल के लिए जो ज्वलंत सच है, वह बाकी भारत में भी प्रासंगिक है।मुख्य सवाल यह है कि हम मई दिवस क्यों मनाते हैं? इतिहास के अपने नायकों को क्यों याद करते हैं? इसलिए कि हम उनके संघर्ष और बलिदान की उदात्त भावना से प्रेरणा ले सकें और उनके संघर्ष की परिस्थितियों, नारों और तौर-तरीकों को ठीक से समझ-बूझकर आज की परिस्थिति में उनका सर्जनात्मक उपयोग कर सकें। यह मंतव्य एकदम सही है कि जब तक लोग कुछ सपनों और आदर्शों को लेकर लड़ते रहते हैं, किसी ठोस, न्यायपूर्ण मकसद को लेकर लड़ते रहते हैं, तब तक अपनी शहादत की चमक से राह रोशन करने वाले पूर्वजों को याद करना उनके लिए रस्म या रुटीन नहीं होता। यह एक जरूरी आपसी, साझा, याददिहानी का दिन होता है, इतिहास के पन्नों पर लिखी कुछ धुँधली इबारतों को पढ़कर उनमें से जरूरी बातों की नये पन्नों पर फिर से चटख रोशनाई से इन्दराजी का दिन होता है, अपने संकल्पों से फिर नया फौलाद ढालने का दिन होता है।बशर्ते कि हम गुमशुदा सपनों  और बाजार में बिके हुए आदर्शों को अपने सीने में डालकर कुछ नया करने का माद्दा रखते हों।


इस महान दिन का राजनीतिक निहितार्थ उत्तरोत्तर लुप्त होता जा रहा है और आयोजन के लिए आयोजन का रिवाज बनता जा रहा है। पूंजीवादी और अवसरवादी (कथन में समाजवादी और करनी में पूंजीवादी) राजनीति के घने बादलों के बीच मई दिवस का सूर्य तत्काल ढंक सा गया है।



मई दिवस (1 मई 1886) की घटनाओं को याद कर लेना और शहीदों की प्रतिमाओं पर फूल माला चढ़ाकर इतिश्री कर लेना पूंजीवादी तरीका है। यह धर्म राष्ट्रवादी राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दिखता हुआ धार्मिक कर्मकांड के अलावा कुछ नहीं है।


जबसे भारत में नवउदारवादी विकास का माडल औपचारिक रुप से लागू हुआ, यानी बहुसंख्य जनता और किसानों मजदूरों, छोटे व्यापारियों के हितों की बलि देकर बाजार के अनुरुप अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली का कायाकल्प होने लगा कारपोरेट सरकारों के कारपोरेट नीति निर्धारण के तहत,तबसे लेकर आज तक कभी इस रस्मअदायगी में कोई व्यवधान नहीं आया। पर कहीं भी मजदूरों कामगारों के हक हकूक की कोई लड़ाई शुरु करने में इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर भारत में मई दिवस को याद करने का अवसर नहीं आया।


इस समय समय में देश में श्रमिक हित हेतु गठित मुख्यतः अखिल भारतीय स्तर के चार-पांच श्रमिक संगठन हैं जिनमें प्रमुख हैं भाकपा की नीतियों से जुड़ी अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), माकपा से जुड़ी सेन्टर ऑफ ट्रेड यूनियन (सीटू), कांग्रेस की छत्रछाया पायी भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भाजपा के विचारधारा से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) है। इनके अलावा इन्हीं के बीच से स्वार्थ वशीभूत होकर आपसी मतभेद के कारण उभरे अनेक श्रमिक संगठन भी हैं जिनमें हिन्दुस्तान मजदूर पंचायत, हिन्दुस्तान मजदूर सभा, किसान ट्रेड यूनियन आदि। जिनपर भी किसी न किसी राजनीतिक दलों की छाया विराजमान है। श्रमिकों के हित का संकल्प लेने वाले ये श्रमिक संगठन देश के मजदूरों को कभी भी एक मंच पर होने नहीं देते।


संगठित क्षेत्र में मजदूर आंदोलन का एक ही मतलब रह गया है वेतनमान और भत्तों में । इस आंदोलनका न देश के बहुसंख्य जनता और न कामगार तबके के लिए कोई मायने नहीं रह गया। मजदूर संगठन इन्हीं मांगों को लेकर इसके साथ आम जनता की कुछ मागो को लेकर आंदोलन पर उतरते हैं। समस्याएं जहा कि तहां रह जाती हैं। जो छंटनी या स्वेच्छा अवसर योजना या विनिवेश या आधिुनिकीकरण के शिकारहुए उनकी बहाली के लिए कतई लड़े बिना अंततः वेतनमान और भत्तो के मुद्दे पर समझौते कर लिये जाते है। मजदूरविरोधी हर कारपोरेट फैसलों में इनमजदूर संगठनों की सहमति होती है और अमूमन फैसला लागू करते वक्त इन संगठनों के नेता अक्सर सपरिवार दूसरों के खर्च पर विदेस यात्राओं पर होते हैं। इसी निरंतर विश्वास घात का मनाम है उत्तरआधुनिक मजदूर आंदोलन।



इस मई दिवस के अवसर पर क्रांतिकारी ट्रेड यूनियनों को चाहिए कि वे तमाम गैर प्रजातांत्रिक कदमों - महंगाई, भ्रष्टाचार, पर्यावरण के क्षरण, भूमि हथियाने आदि के खिलाफ उत्पीड़ित जनता के संघर्ष के साथ एकजुट हों।भूमंडलीयकरण के इस युग में सबसे ज्यादा प्रभावित आज का मेहनतकश वर्ग हुआ है।


सरकार की नई आर्थिक नीतियो के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक बड़े -बड़े उद्योग घाटे के नाम से कुछ बंद कर दिये गये तो कुछ निजी हाथों में सौंप दिये गये। इन उद्योगों में कार्य कर रहे अधिकांश लोगों को स्वैच्छिक सेवा के तहत कार्य सेवा से बहुत पहले ही मुक्त कर बेरोजगार की पंक्ति में खड़ा कर दिया गया।मई दिवस पर सामाजिक व उत्पादक सक्तियों का साझा मोर्चा बनाकर हालात बदलने का संकल्प भी किया जा सकता है।


कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो!


मगर इसके लिए जो जज्बा चाहिेए,वह हममें नदारद है।




आज हालात ऐसे उभर चले है कि मजदूर संगठनों की आवाज भी नहीं सुनी जा रही है। इसका ताजा उदाहरण है कि अभी हाल ही में देश के समस्त मजदूर संगठनों ने सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों एवं बढ़ती महंगाई को लेकर एक दिन की आम हड़ताल की पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। इस हड़ताल में पहली बार देश के सभी श्रमिक संगठन शामिल हुए तथा औद्योगिक क्षेत्रों,  सार्वजनिक बैंकों में हड़ताल शत् प्रतिशत सफल रही। करोडों का नुकसान हुआ। श्रमिकों की एक दिन की मजदूरी कटी पर सरकार पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। उलटे मजदूरों की गाढ़ी कमाई से एकत्रित की गई भविष्य निधि की राशि पर व्याज दर घटा दी गई। जो कुछ नुकसान हुआ देश का हुआ, आम जन का हुआ,मजदूरों का हुआ जिससे इनका कोई लेना देना नहीं। इसकी भरपाई तो देश की अवाम टैक्स भरकर कर ही देगी। फिर हड़ताल हो या बंद, क्या फर्क पड़ता है ?


ऐसा इसलिए हुआ कि श्रमिक संगठन राजनीतक दलों के साथ नत्थी हैं औरर उन्हीके हितों के मुताबिक आंदोलन की परिणति हो जाती है। अक्सर जिन नीतियों और कानूनों के खिलाफ आंदोलन होते हैं, इन  संगठनों से जुड़े राजनीतिक दलों के सांसदद और विधायक उन्हें पास कराते हैं और कोई विरोध भी दर्ज नहीं करते। राजनीतिक नेतृत्वके मातहत होने की वजह से ही भारतीय मजदूर संगठनों की कोई स्वायत्ता नहीं होती और आंदोलनों को ​​बेअसर   करने वाली राजनीतिक व्यवस्था में बैठे हुए लोगों के मातहत श्रमिक नेतृत्व इस लसिलसिले में कुछ कर भी नहीं पाता।


इस तरह के बदलते परिवेश में देश के श्रमिक संगठनों को मई दिवस की प्रासंगिकता के संदर्भ में श्रमिकों के हित में अपनी कार्यशैली, सोच एवं तौर तरीके बदलने होंगे।


साल 2011 का यह फैसला ऐसे दौर में आया है जब निजीकरण (पीपीपी), छंटनी, तालाबन्दी, डाउनसाइजिंग, ठेकाकरण की तेज मुहिम चल रही है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) व 'लचीले श्रम कानून' के बहाने लम्बे संघर्षों के दौरान मिले कानूनो को छीनना जायज ठहराया जा चुका है। राज्य मशीनरी ज्यादा दमनकारी हुई है तो न्यायपालिकाएं ज्यादा आक्रामक और मज़दूर विरोधी फैसलों के लिए कुख्यात।


साल 2011 मज़दूर हादसों में बढ़ोत्तरी का रहा है तो छोटे-बड़े संघर्षों का भी। हालांकि ज्यादातर आन्दोलन छिने जा चुके पुराने अधिकारों की बहाली, श्रम कानूनों को लागू करने, यूनियन बनाने के अधिकार, ठेकेदारी प्रथा को खत्म करने आदि के इर्द-गिर्द और बिखरे-बिखरे रहे। दरअसल, आज मज़दूरों के काम करने की स्थितियां एकदम कठिन हो चुकी हैं।


आधुनिक तकनीकें और सीएनसी मशीनों ने श्रमशक्ति काफी घटा दी हैं। ऊपर से ठेकेदारी में मामूली दिहाड़ी पर 12-12 घण्टे खटना नियम बन चुका है। सुरक्षा के कोई इंतेजाम न होने से रोजमर्रा के हादसे आम बात बन चुकी है। अंग-भंग होने से लेकर जान जाने तक की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।


कारखानों के इर्द-गिर्द डाक्टरों के धन्धे भी खूब चमक गये हैं, क्योंकि घायलों के कथित इलाज के बहाने कम्पनियों के कुकर्मों को ढकने का ठेका इन्हीं के पास होता है। यह भी गौरतलब है कि अवसरवादी हो चुकी पुरानी ट्रेड यूनियनें, उनके महासंघ और मठाधीश मज़दूर नेताओं की काली करतूतें कोढ़ में खाज का काम कर रही हैं। इसी आलोक में वर्ष 2011 के कुछ मज़दूर संघर्षों पर नजर डालते हैं :-


देशी-विदेशी कम्पनियों के नये हब गुजरात के आलोक में बहुराष्ट्रीय जनरल मोटर के मज़दूरों का संघर्ष, पश्चिम बंगाल में मज़दूर क्रान्ति परिषद के नेतृत्व में बन्द कारखानों के मज़दूरों का बन्दी भत्ता बढ़ाने का आन्दोलन, ईसीएल के खुदिया कोयलरी में पीस रेट श्रमिकों की हड़ताल, महाराष्ट्र में वोल्टास कारखाने की बन्दी के खिलाफ सफल मज़दूर आन्दोलन, तामिलनाडु में न्यूक्लियर एनर्जी परियोजना विरोधी आन्दोलन, उड़ीसा में पास्को विरोधी प्रतिरोध संघर्ष, उत्तर प्रदेश में भटनी से लेकर अलीगढ़, ग्रेटर नोएडा तक जमीन छीने जाने के खिलाफ किसानों के उग्र आन्दोलन, गोरखपुर का मज़दूर आन्दोलन, उत्तर प्रदेश के लम्बे समय से बन्द कताई मिलों के मज़दूरों का सामूहिक सेवानिवृत्ति के लिए लखनऊ में कई दौर के धरना-प्रदर्शन के बाद वी.आर.एस. की प्राप्ति, सहित तमाम प्रतिरोध आन्दोलन पूरे वर्ष चलते रहे।


इस क्रम में उत्तराखण्ड में जहाँ 4600 शिक्षामित्रों का नियमितीकरण को लेकर सतत जारी आन्दोलन और पुलिसिया दमन 2011 में सुर्खियों में रहा, वहीं बी.पी.एड. प्रशिक्षित बेराजगारों का भी आन्दोलन चलता रहा।


उधर राज्य के औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल में लगातार बढ़ते शोषण-दमन और छंटनी के खिलाफ छिटपुट संघर्ष भी पूरे साल होते रहे। इनमें मंत्री मेटेलिक्स पंतनगर, एवरेडी हरिद्वार, बु्रशमैन लि. पंतनगर, सूर्या रोशनी काशीपुर, आई.एम.पी.सी.एल. मोहान-अल्मोड़ा आदि के संघर्ष प्रमुख हैं। वोल्टास लिमिटेड पंतनगर में ठेकेदारी के खत्मे और श्रम कानूनों को लागू करने आदि मुद्दों को लेकर आन्दोलन अभी भी चल रहा है।


इसी के बीच विदेशी कम्पनियों के हितानुरूप बीमा संसोधन बिल के खिलाफ सार्वजनिक बीमा कर्मियों के आन्दोलन की कुछ कवायदें और सार्वजनिक बैंक कर्मियों के हड़ताल की रस्मअदायगी भी सम्पन्न हुई। सार्वजनिक क्षेत्र के कोल इण्डिया लि. की 10 फीसदी भागेदारी बाजार में बेंचने का विरोध भी सामान्य रहा।


इस वर्ष सर्वाधिक सुर्खियों में रहा गुडगाँव-मानेसर में मारुति सुजकी, सुजुकी पॉवरट्रेन, सुजुकी बाइक के मज़दूरों का जुझारू संघर्ष। तमाम उतार-चढ़ावों से भरे इस महत्वपूर्ण आन्दोलन ने कुछ नये सवाल खड़े कर दिये और एक नयी बहस को जन्म दे दिया।


'मज़दूर जीते या हारे', 'नेताओं ने धोखा दिया या मजबूर थे', 'ट्रेड यूनियन महासंघों की भूमिका संदिग्ध थी' 'मज़दूरों की तो आज यही नियति है', 'मज़दूरों में चेतना का अभाव था', 'नेताओ में वैचारिक अपरिपक्वता थी', 'आन्दोलन के दौर के समर्थक-पक्षधर लोग निराश हुए'... आदि-आदि। आज के कठिन दौर में मज़दूर आन्दोलन के सामने यह एक बेहद चुनौतीपूर्ण प्रश्न है। सबक के तौर पर इस मुद्दे पर गहन विचार मंथन जरूरी है।


यह सच है कि 21वीं सदी का मज़दूर आन्दोलन मुश्किल भरे दौर से गुजर रहा है। जहाँ आज श्रम और पूँजी ज्यादा खुलकर आमने-सामने खड़ी हैं, वहीं श्रम विभाजन ज्यादा जटिल हो गया है। इसने मानव जीवन के समस्त पहलुओं को अपने प्रभाव में ले लिया है। वैश्विक पूँजी एकाकार हुई है, तो दुनिया का मज़दूर वर्ग भी एकदूसरे से अदृश्य धागे में बंधा है। एक रूप में 'दुनिया के मज़दूरों, एक हो' का नारा आज ज्यादा सार्थक अर्थ ग्रहण कर रहा है।


लेकिन ठीक इसी मुकाम पर आज का मज़दूर वर्ग पहले से ज्यादा विभाजित है। जाति-मजहब-क्षेत्र, परमानेण्ट-कैजुअल-ठेका, सरकारी-निजी जैसे बहुविध बंटवारे तो पहले से ही थे, अब इस दौर में सेवा क्षेत्र जैसे नये-नये सेक्टरों के खुलने से श्रमशक्ति का बहुस्तरीय विभाजन हुआ है। वैज्ञानिक प्रबंधन की अपनी तकनीक के जरिए पूँजीवाद ने नये श्रमविभाजन से वैर-भावपूर्ण (जलनपूर्ण, दुश्मनाना) सामाजिक रिश्तों का निर्माण किया है।


मोबाइल-नेट की दुनिया इसे मुकम्ल बना रही है। उत्पादन के साधन और शोषण के तरीके ज्यादा उन्नत व जटिल हुए हैं, तो मज़दूर वर्ग के संघर्ष लगभग पुराने रास्ते पर ही चल रहे हैं - नये तरीकों की बात करते हुए भी।


आज हमारे सामने बिखरी, किन्तु केन्द्रीकृत असेंबली लाइन पर बिखरी हुई मज़दूर आबादी है। यूं तो ज्यादातर काम ठेकेदारी के मातहत है। उस पर भी मूल कारखाने का अधिकतम काम बाहर होता है, जहॉं उनके वेण्डर, उनके भी सब वेण्डर और उसके भी नीचे पीस रेट पर काम करने वालों की पूरी एक चेन है। यह स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है।


इस प्रकार एक ही उत्पाद में लगी पूरी आबादी खण्डों में बिखरी हुई है। थोड़े से परमानेण्ट मज़दूरों को छोड़ कर भारी आबादी बेहद कठिन परिस्थितियों व मामूली दिहाडी पर खटते हुए बेहद जिल्लत की जिन्दगी जीने को अभिशप्त है।


संगठित क्षेत्र की होकर भी यह असंगठित आबादी संगठित कैसे हो, यह बड़ी चुनौती है। ऐसे मे कभी-कभार होने वाले स्फुट संघर्ष मज़दूरों की चेतना और संघर्षशीलता को आगे ले जाने की जगह कई बार पीछे धकेल देते हैं। यह भी होता है कि स्थाई मज़दूर अपने वेतन बढोत्तरी की लड़ाई में कैजुअल और ठेका मज़दूरों का इस्तेमाल कर ले जाते हैं और वे ठगे रह जाते हैं। संधर्षों के बावजूद मज़दूरों का क्रान्तिकारीकरण भी नहीं हो पाता है।


ध्वस्त उत्पादन प्रणाली के गवाह ये आंकड़े हैं।औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) पर आधारित देश की औद्योगिक उत्पादन दर फरवरी 2013 में 0.6 फीसदी रही, जो वित्त वर्ष 2011-12 की समान अवधि में 4.30 फीसदी थी। यह जानकारी शुक्रवार को जारी केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के आंकड़ों से सामने आई है।


उपभोक्ता वस्तु को छोड़कर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में समाहित अन्य सभी क्षेत्रों को गिरावट का सामना करना पड़ा। खनन, बिजली और उपभोक्ता गैर टिकाऊ वस्तु क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इससे पता चलता है कि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में औद्योगिक सुस्ती जारी है। आईआईपी में जनवरी में 2.4 फीसदी तेजी आई थी।


आलोच्य अवधि में खनन उत्पादन में 8.1 फीसदी की गिरावट रही, जिसमें पिछले साल की समान अवधि में 2.3 फीसदी तेजी थी। जनवरी 2013 में इसमें 2.9 फीसदी गिरावट रही।


आलोच्य अवधि में बिजली उत्पादन में 3.2 फीसदी गिरावट रही, जिसमें पिछले वर्ष की समान अवधि में आठ फीसदी तेजी थी।


इसी अवधि में हालांकि विनिर्माण उत्पादन में 2.2 फीसदी तेजी रही, जिसमें पिछले वर्ष की समान अवधि में 4.1 फीसदी तेजी थी।


उपभोक्ता वस्तु में 0.5 फीसदी तेजी रही, जिसमें एक साल पहले 0.4 फीसदी गिरावट थी।


अप्रैल 2012 से फरवरी 2013 तक की कुल अवधि में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले 0.9 फीसदी रही।


कारेाबारी क्षेत्र की दृष्टि से सर्वाधिक गिरावट वाले क्षेत्र रहे बिस्किट (-26.8 फीसदी), ग्राइंडिंग व्हील (-34.2 फीसदी), स्टाम्पिंग एंड फोर्जिग (-24.4 फीसदी), मशीन टूल्स (-51.9 फीसदी), अर्थ मूविंग मशीनरी (-20 फीसदी) और वाणिज्यिक वाहन (-23.6 फीसदी)।


सर्वाधिक तेजी वाले क्षेत्रों में रहे काजू की गरी (83.4 फीसदी), परिधान (16.00 फीसदी), चमड़े के परिधान (39.6 फीसदी), पानी का जहाज, निर्माण और मरम्मत (105.4 फीसदी), कंडक्टर, एल्यूमीनियम (66.00 फीसदी), केबल, रबर इंसुलेटेड (188.5 फीसदी)।



दरअसल विकेन्द्रीकरण की मौजूदा प्रक्रिया ने समग्र तौर पर पूंजीवादी उत्पादन को अपने सारतत्व में और अधिक एकीकृत, केन्द्रीकृत कर दिया है। विकेन्द्रीकृत वह जिस हद तक भी हुआ है वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर, उत्पादन इकाइयों के आंदोलनों की जमीन तैयार कर रहा है क्योंकि आत्मनिर्भर औद्योगिक इकाइयों में अन्य उद्योगों से जो पार्थक्य का तत्व था उसको  इसने खत्म कर दिया है। हालांकि पूंजीवादी उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर उत्पादन या शेष उत्पादक इकाइयों से पूरी तरह पार्थक्य संभव नहीं है।


जो विकेन्द्रीकरण हुआ है उसने एक मुख्य उत्पादक इकाई के इर्द गिर्द सहायक उत्पादक इकाइयों (एसीसरीज) का जो जाल खड़ा किया है उसने इसको एक नए संकट की तरफ धकेला है। इसने उत्पादक इकाइयों को नए संबंधों में जोड़ दिया है। एक के प्रभावित होने पर इस जाल में बंधी सभी उत्पादक इकाइयों के प्रभावित होने के खतरे बढ़ गए हैं। विकेन्द्रीकरण के इस जाल में पृथकता का तत्व आभासी रूप से हावी दिखायी देता है लेकिन दूसरे रूप में इसने एक नयी परस्पर संबद्ध संरचना का वास्तविक जाल तैयार कर दिया है।


इस जाल के तार चूंकि राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पैमाने पर जुड़े हैं इसलिए इनमें से किसी एक में पैदा होने वाला संकट सभी को अपनी चपेट में अवश्यंभावी तौर पर ले लेगा। कुल मिलाकर विकेन्द्रीकृत केन्द्रीकरण की उत्पादन प्रणाली ने भावी मजदूर आंदोलन के फलक को और ज्यादा विस्तारित किया है। उसे राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पैमाने तक फैला दिया है। इसने न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर संगठित मजदूर आंदोलन के आधार को मजबूत किया है।


इस तरह दुनिया भर के मजदूरों के साझा संघर्षों के नारे को पहले से अधिक मौजू बना दिया है। 'दुनिया के मजदूरो,एक हो' का नारा उत्पादन के विकेन्द्रीकृत केन्द्रीकरण की प्रक्रिया में और अधिक प्रासंगिक हो गया है।


विकेन्द्रीकृत केन्द्रीकरण की उत्पादन प्रणाली के गहन जाल के किसी एक तंतु पर ही सारा ध्यान केन्द्रित करने पर यह निराशावादी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अब एक इकाई या एक एक कारखाने के संघर्ष उस इकाई में उत्पादन को ठप्प नहीं कर सकते इसलिए कारखाना आधारित संघर्षों का युग अब खत्म हो गया है।


विकेन्द्रीकृत केन्द्रीकरण की प्रणाली के चलते एक कारखाने में बड़े पैमाने पर संगठित मजदूरों की संख्या का घटते जाना या उनकी संघर्षशीलता के लुप्त होते जाने की भविष्यवाणी भी अपने आप में कितनी बेतुकी है इसे मौजूदा गुड़गांव के ऑटो मजदूरों के संघर्ष से समझा जा सकता है।


मजदूरो को आज नये तरीके से चीजों को शुरू करना पड़ेगा। हड़ताल को अन्तिम हथियार समझकर संघर्ष के नये तौर तरीके विकसित करने होंगे। जमीनी स्तर पर कामों को केन्द्रित करना होगा। सार्थक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए सही रणनीति जरूरी है और सही रणनीति के लिए वस्तुस्थिति व मौजूदा हक़ीकत को समझना बेहद आवश्यक है।


निजीकरण, विनिवेश , अबाध विदेशी पूंजी और कल कारखानों में क्लोजर, लाकआउट, छंटनी के जरिये जो एकाधिकारवादी आक्रमण मजदूरवर्ग पर हो रहा है, उसके प्रतिरोध में किसी भी मई दिवस पर नये आंदोलन की शुरुआत नहीं हुई है पिछले बीस साल के दरम्यान। इस लिए मई दिवसपालन मात्र रस्म अदायगी भर रह गया है और फिलहाल इससे दूसरा कोई तात्पर्य निकलता हुआ देखता नहीं।सनद रहें कि 18 मई, 1882 में 'सेन्ट्रल लेबर यूनियन ऑफ़ न्यूयार्क' की एक बैठक में पीटर मैग्वार ने एक प्रस्ताव रखा, जिसमें एक दिन मजदूर उत्सव मनाने की बात कही गई थी। उसने इसके लिए सितम्बर के पहले सोमवार का दिन सुझाया। यह वर्ष का वह समय था, जो जुलाई और 'धन्यवाद देने वाला दिन' के बीच में पड़ता था। भिन्न-भिन्न व्यवसायों के 30,000 से भी अधिक मजदूरों ने 5 दिसम्बर को न्यूयार्क की सड़कों पर परेड निकाली और यह नारा दिया कि "8 घंटे काम के लिए, 8 घंटे आराम के लिए तथा 8 घंटे हमारी मर्जी पर।" इसे 1883 में पुन: दोहराया गया। 1884 में न्यूयार्क सेंट्रल लेबर यूनियन ने मजदूर दिवस परेड के लिए सितम्बर माह के पहले सोमवार का दिन तय किया। यह सितम्बर की पहली तारीख को पड़ रहा था। दूसरे शहरों में भी इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाने के लिए कई शहरों में परेड निकाली गई। मजदूरों ने लाल झंडे, बैनरों तथा बाजूबंदों का प्रदर्शन किया। सन 1884 में एफ़ओटीएलयू ने हर वर्ष सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूरों के राष्ट्रीय अवकाश मनाने का निर्णय लिया। 7 सितम्बर, 1883 को पहली बार राष्ट्रीय पैमाने पर सितम्बर के पहले सोमवार को 'मजदूर अवकाश दिवस' के रूप में मनाया गया। इसी दिन से अधिक से अधिक राज्यों ने मजदूर दिवस के दिन छुट्टी मनाना प्रारम्भ किया।इन यूनियनों तथा उनके राष्ट्रों की संस्थाओं ने अपने वर्ग की एकता, विशेषकर अपने 8 घंटे प्रतिदिन काम की मांग को प्रदर्शित करने हेतु 1 मई को 'मजदूर दिवस' मनाने का फैसला किया। उन्होंने यह निर्णल लिया कि यह 1 मई, 1886 को मनाया जायेगा। कुछ राज्यों में पहले से ही आठ घंटे काम का चलन था, परन्तु इसे क़ानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी; इस मांग को लेकर पूरे अमरीका में 1 मई, 1886 को हड़ताल हुई। मई 1886 से कुछ वर्षों पहले देशव्यापी हड़ताल तथा संघर्ष के दिन के बारे में सोचा गया। वास्तव में मजदूर दिवस तथा कार्य दिवस संबंधी आंदोलन राष्ट्रीय यूनियनों द्वारा 1885 और 1886 में सितम्बर के लिए सोचा गया था, लेकिन बहुत से कारणों की वजह से, जिसमें व्यापारिक चक्र भी शामिल था, उन्हें मई के लिए परिवर्तित कर दिया। इस समय तक काम के घंटे 10 प्रतिदिन का संघर्ष बदलकर 8 घंटे प्रतिदिन का बन गया।



मई दिवस या 'मजदूर दिवस' या 'श्रमिक दिवस' 1 मई को सारे विश्व में मनाया जाता है।मई दिवस या 'मजदूर दिवस' या 'श्रमिक दिवस' 1 मई को सारे विश्व में मनाया जाता है।


भारत में 'मई दिवस'


कुछ तथ्यों के आधार पर जहाँ तक ज्ञात है, 'मई दिवस' भारत में 1923 ई. में पहली बार मनाया गया था। 'सिंगारवेलु चेट्टियार' देश के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली ट्रेंड यूनियन और मजदूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस मनाने का सुझाव दिया था, क्योंकि दुनिया भर के मजदूर इसे मनाते थे। उन्होंने फिर कहा कि सारे देश में इस मौके पर मीटिंगे होनी चाहिए। मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गयी। इस अवसर पर वहाँ दो जनसभाएँ भी आयोजित की गईं तथा दो जुलूस निकाले गए। पहला उत्तरी मद्रास के मजदूरों का हाईकोर्ट 'बीच' पर तथा दूसरा दक्षिण मद्रास के ट्रिप्लिकेन 'बीच' पर निकाला गया।


सिंगारवेलू ने इस दिन 'मजदूर किसान पार्टी' की स्थापना की घोषणा की तथा उसके घोषणा पत्र पर प्रकाश डाला। कांग्रेस के कई नेताओं ने भी मीटिंगों में भाग लिया। सिंगारवेलू ने हाईकार्ट 'बीच' की बैठक की अध्यक्षता की। उनकी दूसरी बैठक की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी शर्मा ने की तथा पार्टी का घोषणा पत्र पी.एस. वेलायुथम द्वारा पढ़ा गया। इन सभी बैठकों की रिपोर्ट कई दैनिक समाचार पत्रों में छपी। मास्को से छपने वाले वैनगार्ड ने इसे भारत में पहला मई दिवस बताया।


फिर दुबारा 1927 में सिंगारवेलु की पहल पर मई दिवस मनाया गया, लेकिन इस बार यह उनके घर मद्रास में मनाया गया था। इस अवसर पर उन्होंने मजदूरों तथा अन्य लोगों को दोपहर की दावत दी। शाम को एक विशाल जूलुस निकाला गया, जिसने बाद में एक जनसभा का रूप ले लिया। इस बैठक की अध्यक्षता डा.पी. वारादराजुलू ने की। कहा जाता है कि तत्काल लाल झंडा उपलब्ध न होने के कारण सिंगारवेलु ने अपनी लड़की की लाल साड़ी का झंडा बनाकर अपने घर पर लहराया।


अमरीका में 'मजदूर आंदोलन' यूरोप व अमरीका में आए औद्योगिक सैलाब का ही एक हिस्सा था। इसके फलस्वरूप जगह-जगह आंदोलन हो रहे थे। इनका संबंध 1770 के दशक की अमरीका की आज़ादी की लड़ाई तथा 1860 ई. का गृहयुद्ध भी था। इंग्लैंड के मजदूर संगठन विश्व में सबसे पहले अस्तित्व में आए थे। यह समय 18वीं सदी का मध्य काल था। मजदूर एवं ट्रेंड यूनियन संगठन 19वीं सदी के अंत तक बहुत मज़बूत हो गए थे, क्योंकि यूरोप के दूसरे देशों में भी इस प्रकार के संगठन अस्तित्व में आने शुरू हो गए थे। अमरीका में भी मजदूर संगठन बन रहे थे। वहाँ मजदूरों के आरम्भिक संगठन 18वीं सदी के अंत में और 19वीं सदी के आरम्भ में बनने शुरू हुए। मिसाल के तौर पर फ़िडेलफ़िया के शूमेकर्स के संगठन, बाल्टीमोर के टेलर्स[2] के संगठन तथा न्यूयार्क के प्रिन्टर्स के संगठन 1792 में बन चुके थे। फ़र्नीचर बनाने वालों में 1796 में और 'शिपराइट्स' में 1803 में संगठन बने। हड़ताल तोड़ने वालों के ख़िलाफ़ पूरे अमरीका में संघर्ष चला, जो उस देश में संगठित मजदूरों का अपनी तरह एक अलग ही आंदोलन था। हड़ताल तोड़ना घोर अपराध माना जाता था और हड़ताल तोड़ने वालों को तत्काल यूनियन से निकाल दिया जाता था।


अमरीका में 18वें दशक में ट्रेंड यूनियनों का शीघ्र ही विस्तार होता गया। विशिष्ट रूप से 1833 और 1837 के समय। इस दौरान मजदूरों के जो संगठन बने, उनमें शामिल थे- बुनकर, बुक वाइन्डर, दर्जी, जूते बनाने वाले लोग, फ़ैक्ट्री आदि में काम करने वाले पुरुष तथा महिला मजदूरों के संगठन। 1836 में '13 सिटी इंटर ट्रेंड यूनियन ऐसासिएशन' मोजूद थीं, जिसमें 'जनरल ट्रेंड यूनियन ऑफ़ न्यूयार्क' (1833) भी शामिल थी, जो अति सक्रिय थी। इसके पास स्थाई स्ट्राइक फ़ंड भी था, तथा एक दैनिक अख़बार भी निकाला जाता था। राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने की कोशिश भी की गयी यानी 'नेशनल ट्रेंड्स यूनियन', जो 1834 में बनायी गयी थी। दैनिक काम के घंटे घटाने के लिए किया गया संघर्ष अति आरम्भिक तथा प्रभावशाली संघर्षों में एक था, जिसमें अमरीकी मजदूर 'तहरीक' का योगदान था। 'न्यू इंग्लैंड के वर्किंग मेन्स ऐसासिएशन' ने सन 1832 में काम के घंटे घटाकर 10 घंटे प्रतिदिन के संघर्ष की शुरुआत की।1835 तक अमरीकी मजदूरों ने काम के 10 घंटे प्रतिदिन का अधिकार देश के कुछ हिस्सों में प्राप्त कर लिया था। उस वर्ष मजदूर यूनियनों की एक आम हड़ताल फ़िलाडेलफ़िया में हुई। शहर के प्रशासकों को मजबूरन इस मांग को मानना पड़ा। 10 घंटे काम का पहला क़ानून 1847 में न्यायपालिका द्वारा पास करवाकर हेम्पशायर में लागू किया गया। इसी प्रकार के क़ानून मेन तथा पेन्सिल्वानिया राज्यों द्वारा 1848 में पास किए गए। 1860 के दशक के शुरुआत तक 10 घंटे काम का दिन पूरे अमरीका में लागू हो गया।


अब से 124 वर्षों पहले मई दिवस के वीर शहीदों - पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल, फिशर और उनके साथियों के नेतृत्व में शिकागो के मजदूरों ने आठ घण्टे के कार्यदिवस के लिए एक शानदार, एकजुट लड़ाई लड़ी थी। तब हालात ऐसे थे कि मजदूर कारखानों में बारह, चौदह और सोलह घण्टों तक काम करते थे। काम के घण्टे कम करने की आवाज उन्नीसवीं शताब्दी के मध्‍य से ही यूरोप, अमेरिका से लेकर लातिन अमेरिकी और एशियाई देशों तक के मजदूर उठा रहे थे। पहली बार 1862 में भारतीय मजदूरों ने भी इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। 1 मई, 1886 को पूरे अमेरिका के 11,000 कारखानों के तीन लाख अस्सी हजार मजदूरों ने आठ घण्टे के कार्यदिवस की माँग को लेकर एक साथ हड़ताल की शुरुआत की थी। शिकागो शहर इस हड़ताल का मुख्य केन्द्र था। वहीं 4 मई को इतिहास-प्रसिध्द 'हे मार्केट स्क्वायर गोलीकाण्ड' हुआ। फिर मजदूर बस्तियों पर भयंकर अत्याचार का ताण्डव हुआ। भीड़ में बम फेंकने के फर्जी आरोप (बम वास्तव में पुलिस के उकसावेबाज ने फेंका था) में आठ मजदूर नेताओं पर मुकदमा चलाकर पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फिशर को फाँसी दे दी गयी। अपने इन चार शहीद नायकों की शवयात्रा में छह लाख से भी अधिक लोग सड़कों पर उमड़ पड़े थे। पूरे अमेरिकी इतिहास में इतने लोग केवल दासप्रथा समाप्त करने वाले लोकप्रिय अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की हत्या के बाद, उनकी शवयात्रा में ही शामिल हुए थे।


शिकागो की बहादुराना लड़ाई को ख़ून के दलदल में डुबो दिया गया, पर यह मुद्दा जीवित बना रहा और उसे लेकर दुनिया के अलग-अलग कोनों में मजदूर आवाजें उठाते रहे और कुचले जाते रहे। काम के घण्टे की लड़ाई उजरती ग़ुलामी के खिलाफ इंसान की तरह जीने की लड़ाई थी। यह पूँजीवाद की बुनियाद पर चोट करने वाला एक मुद्दा था। इसे उठाना मजदूर वर्ग की बढ़ती वर्ग-चेतना का, उदीयमान राजनीतिक चेतना का परिचायक था। इसीलिए मई दिवस को दुनिया के मेहनतकशों के राजनीतिक चेतना के युग में प्रवेश का प्रतीक दिवस माना जाता है।


शिकागो के मजदूरों को कुचल दिया गया। पूरी दुनिया में 8 घण्टे के कार्यदिवस की माँग उठाने वाले मजदूर आन्दोलनों को कुछ समय के लिए पीछे धकेल दिया गया। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को चलाने वाले दूरदर्शी नीति-निर्माता यह समझ चुके थे कि इस माँग को दबाया नहीं जा सकता और पूँजीपतियों के हित में पूँजीवाद को बचाने के लिए 8 घण्टे कार्यदिवस के लिए कानून बना देना ही उचित होगा। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में ही दुनिया के ज्यादातर देशों में ऐसे कानून बनाये जा चुके थे। हालाँकि उन्नत मशीनें लाकर, कम समय में ज्यादा उत्पादन करके मजदूर के शोषण का सिलसिला फिर भी जारी रहा (बल्कि पहले से भी ज्यादा मुनाफा निचोड़ा जाने लगा) फिर भी मजदूर को सोने-आराम करने, परिवार के साथ समय बिताने के लिए, इंसान की तरह जीने के लिए, कुछ वक्त नसीब होने लगा। हालाँकि एक समस्या यह भी थी कि कानून बनने के बावजूद, इसके प्रभावी अमल के लिए मजदूर वर्ग को लगातार लड़ना पड़ा और असंगठित मजदूरों के लिए यह कानून, और ऐसे तमाम कानून कभी भी बहुत प्रभावी नहीं रहे।


प्रथम मजदूर राजनैतिक पार्टी सन 1828 ई. में फ़िलाडेल्फ़िया, अमरीका में बनी थी। इसके बाद ही 6 वर्षों में 60 से अधिक शहरों में मजदूर राजनैतिक पार्टियों का गठन हुआ। इनकी मांगों में राजनैतिक सामाजिक मुद्दे थे, जैसे-


10 घंटे का कार्य दिवस


बच्चों की शिक्षा


सेना में अनिवार्य सेवा की समाप्ति


कर्जदारों के लिए सज़ा की समाप्ति


मजदूरी की अदायगी मुद्रा में


आयकर का प्रावधान इत्यादि।


मजदूर पार्टियों ने नगर पालिकाओं तथा विधान सभाओं इत्यादि में चुनाव भी लड़े। सन 1829 में 20 मजदूर प्रत्याशी फ़ेडरेलिस्टों तथा डेमोक्रेट्स की मदद से फ़िलाडेलफ़िया में चुनाव जीत गए। 10 घंटे कार्य दिवस के संघर्ष की बदौलत न्यूयार्क में 'वर्किंग मैन्स पार्टी' बनी। 1829 के विधान सभा चुनाव में इस पार्टी को 28 प्रतिशत वोट मिले तथा इसके प्रत्याशियों को विजय हासिल हुई।


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