सुंदरता का दुख
सुंदरता का दुख
| Sunday, 09 June 2013 17:05 |
सय्यद मुबीन ज़ेहरा जनसत्ता 9 जून, 2013: गर्मिए-हसरते नाकाम से डर जाते हैं/ हम चिरागों की तरह शाम से जल जाते हैं/ शम्मा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए/ हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं। यह शेर बार-बार याद आने लगा, जब पिछले सप्ताह फिल्म अभिनेत्री नफीसा उर्फ जिया खान की आत्महत्या का समाचार मिला। सुंदरता अंदर से दुखी भी हो सकती है इसका कौन अंदाजा लगा सकता था? परदे पर दुनिया भर की दास्तान बयान करने वाली ये अभिनेत्रियां अपने शरीर की खूबसूरती और होंठों की मुस्कुराहटों के पीछे छिपे दर्द को बयान कर पाने में क्यों विफल हो जाती हैं? शायद फिल्मी पेशे की चमक-दमक में उनके जिस्म और चेहरे की खूबसूरती के पीछे छिपी हुई पीड़ा दब जाती है, और वैसे भी यहां इस व्यवसाय में दर्द सिर्फ सुनहरे परदे पर अच्छा लगता है। पिछले दिनों बॉलीवुड और फैशन जगत ने कई कमसिन हसीनाओं का मरना देखा है। विवेका बाबाजी, नफीसा जोसेफ और कुलजीत रंधावा कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने ग्लैमर नगरी में बड़ी खामोशी से अपने आंसू और आहें छिपा कर इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। छोटी-सी उम्र में नाकामी और निराशा की बेड़ियों ने इन्हें ऐसा जकड़ा कि इससे बाहर निकलने का रास्ता इन्हें केवल अपनी मौत में दिखाई दिया। उस समाज में, जो महिलाओं को लेकर पक्षपात और पूर्वग्रह से ग्रसित हो, एक खूबसूरत और सदा मुस्कान सजाने वाली जीवित मूर्ति बन कर अपने दिलोदिमाग को खुश और संतुलित रख पाना कितना कठिन है इसका अंदाजा इन लोगों के जीवन में छिपे अंधकार से ही लग सकता है, लेकिन फिल्मों की चमक-दमक में यह हकीकत छिपी रहती है। क्या ये महिलाएं नाकामयाबी और अकेलेपन के राक्षस की भेंट चढ़ती रहेंगी? यह सवाल इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आज अधिक से अधिक बच्चियां इस पेशे की चमक-दमक से आकर्षित होकर मॉडलिंग और अभिनय के व्यवसाय में आने के लिए जूझ रही हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम इन महिलाओं के मन और भावनाओं की चिंता करते हुए इनकी मानसिक और सामाजिक सुरक्षा का खयाल रखें। हर व्यवसाय में कभी न कभी उतार-चढ़ाव आता है, लेकिन खूबसूरती और ग्लैमर से भरी इस दुनिया में ऐसा क्या हो जाता है कि ये महिलाएं अपने अस्तित्व को ही मिटा देती हैं। जब भी कोई खूबसूरत अभिनेत्री या फैशन मॉडल आत्महत्या करती है तो उसके लिए संवेदना भरे बयानों और श्रद्धांजलियों की बाढ़-सी आ जाती है। दुख प्रकट करने वाले इन अभिनेत्रियों के अकेलेपन और मानसिक तनाव की बात करते हुए चिंता और दुख में डूबे प्रतीत होते हैं। लेकिन ये दोस्त और जानकार दुख बांटने के समय क्यों नदारद रहते हैं? परिवार और दोस्त सभी बेमानी क्यों हो जाते हैं? बॉलीवुड और फैशन जगत का चलन रहा है कि वे छोटी-छोटी खुशियों को भी बड़ी-बड़ी पार्टियों के द्वारा भुनाने और सजाने की कोशिश करते हैं। क्या शोहरत और चमक-दमक एक ऐसा दोस्त तक नहीं बना पाती, जिसके कंधे पर सिर रख कर दुख की घड़ी में गम हल्का किया जा सके? क्या इनके परिवार की जिम्मेदारी नहीं है कि वे अपनी बेटियों के साथ मजबूती से जरूरत के समय खड़े रहें? उनकी सफलता को जब आप जमाने में बांट सकते हैं तो फिर उनकी नाकामयाबियों को भी कम से कम उनके साथ तो बांटिए। पुराने फिल्मी दौर में अभिनेत्रियों की मां या भाई या रिश्तेदार अक्सर उनके साथ रहते थे और उनको अपना सहयोग-समर्थन देते थे। शायद इसलिए ये अभिनेत्रियां जिंदगी के मुश्किल समय में भी सफल होकर निकलीं और आज भी सुखी हैं। उस पुराने दौर में भी कुछ अभिनेत्रियों का ऐसा दुखद अंत हुआ, लेकिन आखिरी दिनों में भी वे अपने परिवार से जुड़ी दिखीं। मगर आज के जमाने में परिवार इन बच्चियों को अपने काम करने की आजादी तो देता है, लेकिन जब वे उस काम में भटकने लगती हैं तो आगे बढ़ कर हाथ थामता दिखाई नहीं देता। अक्सर अभिनेत्रियों को परिवार से अपनी आर्थिक स्थिति के लिए लड़ना भी पड़ता है। प्यार में नाकामयाबी या अपनापन न मिलने की खीझ भी इन अभिनेत्रियों को खुदकुशी करने पर मजबूर कर देती है। कहीं न कहीं इनमें हौसले की कमी भी होती है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि परिवार से इनका संबंध मजबूत बना रहे। इन अभिनेत्रियों के परिवार के लोगों को समय-समय पर उनसे बातचीत करते रहना चाहिए ताकि उनके मन की थाह ली जाती रहे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर साल एक लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं और 'समांतर संसार' में हमने पहले भी यह बात रखी थी कि आज की युवा महिलाओं में आत्महत्या के लक्षण अधिक और बड़े चिंताजनक होते जा रहे हैं। बॉलीवुड के कई निर्देशकों ने अभिनेत्रियों के अकेलेपन और मानसिक पीड़ा पर फिल्में बनाई हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि इस व्यवसाय में आने वाली युवतियों के लिए बॉलीवुड में कितनी जगह है। हमारे सिनेमा जगत में परिवारवाद के कारण कई काबिल अभिनेत्रियां हाशिये पर चली जाती हैं, जबकि जान-पहचान और दूसरी तरकीबों से कुछ लोग सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जाते हैं? क्या फिल्मी दुनिया को भी अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत नहीं है? इन सवालों का जवाब समाज और इस समाज का मनोरंजन करने वाले बॉलीवुड को अपने अंदर झांक कर तलाशना होगा। जो समाज जिया खान और उन जैसी अभिनेत्रियों की खुदकुशी पर स्तब्ध रह जाता है उसे सोचना होगा कि क्या वह उनके जिंदा रहते उनका अकेलापन दूर करता या नहीं। उनकी चमकती-दमकती जिंदगी के भीतरी अंधेरे को रोशनी की ओर ले जाने वाला कोई साथी या दोस्त क्यों नहीं मिलता? हर समय खिली हुई और हसीन नजर आने की होड़ में शायद ये महिलाएं अपने मानसिक द्वंद्व और मन की उलझनों से बेखबर रहना चाहती हैं और जब ये उलझनें उन्हें इस बेखुदी से जगाती हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसे में दुर्भाग्य से, हमेशा की नींद सोने के अलावा और कोई चारा उन्हें नजर नहीं आता। कुछ सामाजिक विज्ञानियों का मानना है कि आत्महत्या के प्रमुख कारण आत्महत्या करने वाले के व्यक्तित्व से अधिक उस समाज में होते हैं जिसमें वह सांस लेता है। समाज के अधिक हस्तक्षेप या उससेअलग-थलग रहने पर कोई व्यक्ति अपने अंदर एक ऐसी चरम सीमा पार कर जाता है, जहां वह अपने आपको बिल्कुल अकेला महसूस करने लगता है। अक्सर यह भी देखा गया है कि कोई व्यक्तिअपने अहंकार के कारण समाज से किसी भी तरह जुड़ नहीं पाता। ऐसे में वह अकेलेपन और असुरक्षा की भावना में घिर कर अपने जीवन का अंत कर लेता है। यह जरूरी है कि चमक-दमक की दुनिया समाज के बाकी दायरों से भी जुड़ कर रहे। बॉलीवुड और फैशन जगत को खूबसूरती की मूरत बनी इन हसीनाओं को आत्मविश्वास और आत्मसंतुष्टि का भी एक संसार देना होगा। ताकि फिर किसी खूबसूरती का ऐसा बेदर्द अंत न हो सके। इस व्यवसाय में आने वाली युवतियों से भी अनुरोध है कि वे अपने आप को मजबूती से जोड़ कर रखें और किसी भी टूटे हुए रिश्ते को जिंदगी का आखिरी रिश्ता न समझें। याद रखें: 'हौसला हो तो उड़ानों में मजा आता है/ पर बिखर जाएं हवाओं में तो ग़म मत करना।' http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/46550-2013-06-09-11-36-02 |
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