| Friday, 16 August 2013 10:30 |
सुभाष गाताडे उसके तीन बच्चे पैदाइशी विकलांगता के चलते कालकवलित हुए तो आखिरी बच्चा, जो आठ माह का है, उसके भी जिंदा रहने की उम्मीद कम है। 'रशिया टुडे' नामक अखबार में पिछले दिनों लैला की कहानी छपी है। इस पैदाइशी विकलांगता की वजह भी वह जानती है। यह इराक पर अमेरिकी आक्रमण की देन है। मालूम हो कि अमेरिकी सेना द्वारा नजफ पर आक्रमण के दिनों में निश्शेष यूरेनियम से सने हथियारों का किया गया प्रयोग इसका कारण है। 'मेडिसिन, कान्फलिक्ट ऐंड सर्वाइवल' नामक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में अपने लेख में रियाद अब्दुल्ला फाती- जिन्होंने वैज्ञानिकों के इस दल का नेतृत्व किया- लिखते हैं कि उन्होंने इस प्रांत में यूरेनियम मिश्रित मिट््टी पाई है, जो एक तरह से आधुनिक युद्ध की विरासत कही जा सकती है। उन्होंने मोसुल कैंसर रजिस्ट्री और इराकी नेशनल कैंसर रजिस्ट्री में कैंसर की संख्या में हुई बढ़ोतरी को इसी के साथ जोड़ा है। मगर क्या निश्शेष यूरेनियम का असर महज इराक तक सीमित है! एक मई, 2008 को बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के 'वन प्लैनेट प्रोग्राम' में काबुल और कंधार के डॉक्टरों को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि किस तरह पिछले दो सालों में जन्मजात विकलांगता और विद्रूपताओं के मामले लगभग दुगुने हुए हैं। जैसे कहीं शरीर के अवयव टेढेÞ-मेढ़े मिलते हैं तो कहीं सिर सामान्य से छोटा या बहुत बड़ा। अलबत्ता अमेरिकी हुकूमत ने इस मामले में अपने आप को निर्दोष साबित करने की कोशिश की थी, लेकिन कार्यक्रम में ही कनाडा स्थित यूरेनियम मेडिकल रिसर्च सेंटर के हवाले से बताया गया था कि इसका कारण निश्शेष यूरेनियम हो सकता है। वर्ष 2002 और 2003 में इस सेंटर ने अफगान नागरिकों के मूत्र की जांच की थी और कई मामलों में उसकी मात्रा इराक के युद्ध में लड़े सैनिकों की तुलना में सौ गुना अधिक दिखाई दी थी। पिछले दिनों पंजाब के विभिन्न इलाकों में कैंसर के बढ़े मामलों की भी चर्चा चली थी। इसकी शुरुआत फरीदकोट से हुई थी। सिर बड़ा, आंखें बाहर निकली हुर्इं और मुड़े हुए हाथ, जो उनके मुंह तक भी नहीं पहुंच पाते हों और टेढ़े पैर, जो शरीर के ढांचे को संभालने के लायक भी नहीं हैं! जीते-जागते ऐसे बच्चों की तादाद पंजाब के सीमावर्ती जिले फरीदकोट में अचानक बढ़ी दिखी थी। फरीदकोट के बाबा फरीद सेंटर फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन के प्रमुख पृथपाल सिंह द्वारा इस संबंध में की गई जांच के परिणाम सभी को विचलित करने वाले थे। उन दिनों जिले के दौरे पर आए दक्षिण अफ्रीका के टॉक्सिकोलॉजिस्ट डॉ कारिन स्मिट ने इस पहेली को सुलझाने में उनकी मदद की थी। उन्होंने इन बच्चों के बाल के नमूने जर्मन प्रयोगशाला में भेजे। पता चला कि विकलांगता में आई तेजी का कारण इन बच्चों में पाई गई यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा है। फिलवक्त इस बात की जांच चल रही है कि क्या यूरेनियम के अवशेष प्राकृतिक संसाधनों से हैं या निश्शेष यूरेनियम से। प्रश्न है कि एक ऐसे सूबे में जहां यूरेनियम के प्राकृतिक स्रोत भी न हों, वहां बच्चों के खून में यह कहां से अवतरित हुआ? आखिर बच्चों के खून में यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा कहां से आई? 'टाइम्स आॅफ इंडिया' ने (2 अप्रैल, 2009) इस सिलसिले में एक लंबी खबर की थी। यह अलग बात है कि मामले को इस कदर संवेदनशील समझा गया कि मीडिया के बाकी हिस्सों ने भी इस पर मौन ही साधे रखा। अपने लेख 'अफगान वार्स ब्लोबैक फॉर इंडियाज चिल्ड्रेन?' में जे श्रीरमण बताते हैं कि दरअसल, पंजाब की जनता अफगानिस्तान और इराक के युद्धों का खमियाजा भुगत रही है। इन युद्धों में अमेरिका और उसकी सहयोगी सेनाओं ने जिस निश्शेष यूरेनियम का प्रयोग किया, वही बच्चों के विकलांगता की जड़ में है। गौरतलब है कि 7 अक्तूबर, 2001 को अफगानिस्तान पर हमला हुआ और सेंटर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट यही बताती है कि प्रभावित बच्चों की तादाद 'पिछले छह-सात सालों में तेजी से बढ़ी है।' अगर हम विकिरणधर्मिता के विशेषज्ञों से मिलें तो वे बता सकते हैं कि निश्शेष यूरेनियम प्रयुक्त करके बनाए गए हथियारों को जनसंहारक हथियारों में शुमार किया जा सकता है, जिनके इराक में मौजूद होने को लेकर अमेरिका ने दुनिया भर में काफी शोर मचाया था। यह अलग बात है कि अमेरिका के तमाम दावे झूठे साबित हुए थे। जबकि 'अमेरिकी रेडिएशन स्पेशलिस्ट ल्युरेन मोरेट' के मुताबिक 1991 के बाद अमेरिका ने निश्शेष यूरेनियम के हथियारों से वातावरण में नागासाकी में फेंके गए अणु बमों की तुलना में चार लाख गुना अधिक विकिरणधर्मिता फैलाई है। प्रश्न है कि दुनिया पर अपनी चौधराहट कायम करने के लिए लालायित अमेरिका को क्या कभी अपने इन तमाम युद्ध अपराधों के लिए विश्व की अदालत में खींचा जा सकेगा? अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी के लिए उत्सुक तीसरी दुनिया के मुल्कों के तमाम शासक इस मामले में कुछ पहल करेंगे, इसकी उम्मीद कम है। इस मसले पर जनपक्षीय जमातें या बुद्धिजीवी क्यों मौन हैं?
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इस अपराध की सुनवाई कब होगी
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